मनमोहन क्रिश्ना
हिन्दी पर्दे का एक दयालु सज्जन
चेहरा!
जानते हैं? सुनिल दत्त
की प्रथम फ़िल्म ‘रेल्वे प्लेटफोर्म’ का
मशहूर गीत “बस्ती बस्ती परबत परबत गाता जाए
बनजारा, लेकर दिल का एकतारा...” पर्दे पर किसने गाया था? साहिर लुधियानवी के गीत
संग्रह की एक पोकेट बुक का शिर्षक बनी इन पंक्तिओं को स्क्रिन पर गाने वाले थे मनमोहन
क्रिश्ना। इसी तरह से देश की आज़ादी के बाद भारत में धार्मिक समभाव और सदभाव बढाने में
साहिर के “तु हिन्दु बनेगा न मुसलमान बनेगा,
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा...” गीत ने जो असर किया ऐसा शायद ही किसी अन्य
गाने ने किया था। उस बेमिसाल गाने को भी ‘धूल
का फूल’ फ़िल्म में पर्दे पर मनमोहन क्रिष्ना जी ने ही गाया था। उनका नाम आते ही
दर्शकों के दिल दिमाग में एक ऐसे व्यक्ति का चित्र खडा हो जाता है, जिन की आंखों में
अपार करूणा हो और जिनका चेहरा एक दयालु सज्जन की याद ताजा कराता हो।
मनमोहन क्रिश्ना जी
उन दिनों में फ़िल्मों में आये थे, जब सिनेमा की दुनिया को समाज में नीची नजर से देखा
जाता था। बल्कि पढे लिखे लोगों के लिए तो इस से बेहतर कई व्यवसाय थे। फिर पंजाब के
धीबा गांव में १९२२ की ११ अगस्त को जन्मे मनमोहन क्रिश्ना जी के पिताजी तो दाक्तर थे!
उस जमाने में किसी का डोक्टर होना ही उस परिवार की शिक्षा के प्रति अपार रूचि दर्शाता
है। उस खानदान का एक लडका अभिनेता बने? और लडका भी तो अपने पिताजी की तरह पढाई में
अच्छा था जिसने उस जमाने में लाहौर युनिवर्सिटी से फिजीक्स में एम.एस.सी. किया था।
इतना ही नहीं, वे तो कालिज में लेक्चरर के सम्मानजनक पद पर नौकरी भी करते थे।
ऐसे व्यक्ति के लिए
इतनी अच्छी नौकरी छोडकर अभिनय के अनिश्चित क्षेत्र में आना कोई छोटा साहस नहीं था।
मगर फिर भी एक दिन शिक्षा के व्यवसाय को छोड उन्हों ने मुंबई की राह पकड ली। यहाँ आकर
व्ही. शांताराम के साथ जुड गए। यहीं वे उन लीला चिटणीस के हीरो भी बने, जिनकी फ़िल्मों
को देखने उन दिनों के युवा सिनेमागृहों में भीड जमाते थे! शान्तारामजी की उस फ़िल्म
का नाम था ‘अंधों की दुनिया’ और उस में
मनमोहन क्रिश्ना जी ने अपनी आवाज़ में गाने भी गाये थे। शायद कम ही लोगों को पता होगा
कि मनमोहन क्रिश्ना ने एक से अधिक फ़िल्मों में हिन्दी और मराठी दोनों भाषाओं में गीत
गाये थे। जिन में से एक ‘अफ़सर’ में तो
उनका गाया कोमेडी गाना भी था।
इस लिए भी पर्दे पर
गाने गाते मनमोहन क्रिश्ना जी कभी अस्वाभाविक नहीं लगते। मसलन ‘धूल का फूल’ के गीत “तु हिन्दु बनेगा न मुसलमान बनेगा...” को
कभी यु ट्युब पर देखो तो लगेगा जैसे मनमोहन क्रिश्ना जी ही गा रहे हैं। ‘धूल का फूल’ हमने हमारे कालिज के दिनों में
मैटिनी और मोर्निंग शो में कितनी ही बार देखी होगी। मगर हर बार एक नजारा अवश्य दिखने
को मिलता। इस गाने में थियेटर तालीओं से तब गूंज उठता था, जब मनमोहन क्रिश्ना जी इन
पंक्तियों को गाते थे.... “ये दीन (धर्म) के
ताजर (व्यापारी) ये वतन बेचने वाले, इन्सानों की लाशों के कफ़न बेचने वाले, ये महलों
में बैठे हुए कातिल ये लूटेरे, कांटों के एवज (बदले में) रुहे चमन बेचने वाले, तु इनके
लिए मौत का सामान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा..”!
ये शब्द ही इतने अच्छे
हैं कि साहिर की श्रेष्ठतम रचानाओं में इसे शामिल करना ही पडे। मगर मनमोहन क्रिश्ना
जी का अभिनय उन्हें और भी असरदार बना देता था। उस फ़िल्म में क्लाइमेक्स के उनके संवादों
की अदायगी पर भी लोग तालीयां बजाये बिना नहीं रह सकते थे। अपने चाहने वालों की उन तालीओं
का प्रतिघोष उस वर्ष के एवार्ड में भी पडा। कोई आश्चर्य नहीं था कि फ़िल्मफ़ेयर की श्रेष्ठ
सहायक अभिनेता की ट्रोफी उस वर्ष यश चोप्रा निर्देशित ‘धूल का फूल’ के लिए मनमोहन क्रिश्ना जी को मिली थी। यश जी और उनके बडे
भैया बी.आर. चोप्रा के वे एक चहिते कलाकार थे।
बी.आर. चोप्रा की ही
‘नया दौर’ में ‘जुम्मन चाचा’ बने मनमोहन
क्रिश्ना को अपनी दर्दभरी आवाज़ में बाकी मज़दूरों को ये एक छोटा सा संवाद बोलते देखो,
“जितनी जोर की हंसी, उतनी ही जोर का तमाचा...”!
और पूरे गांव के दर्द की एक टीस निकलती सुनाई देगी। इन्हीं बी. आर. चोप्रा की ‘वक्त’ में सुट पहनकर मुंह में पाइप लिए बिलियर्ड
खेलते ‘मित्तल साहब’ बने मनमोहन क्रिश्ना जी उतने ही जचते थे। उन्हें अगर आशा पारेख
और मनोज कुमार की फ़िल्म ‘दो बदन’ में नायिका
के पेइन्टर चाचा के रूप में देखो तो हाथ में ब्रश लिए एक कलाकार भी हुबहु लगते थे।
उनके चेहरे की निर्दोषता का लाभ ‘बीस साल बाद’
के निर्देशक बिरेन नाग ने अच्छा उठाया था। उस फ़िल्म का गाना “कहीं दीप जले कहीं दिल....” लता मंगेशकर के गाये सब से हिट गानों में
शामिल होता है। उस सस्पेन्स फ़िल्म में मनमोहन क्रिश्ना जी का ‘वैदराज’ का बडा ही दिलचश्प
रोल था।
अगर ‘नया दौर’ में वे मुस्लिम ‘जुम्मन चाचा’
बने थे तो राजेन्द्र कुमार और मीनाकुमारी के साथ राजकुमार को चमकाने वाली फ़िल्म ‘दिल एक मंदिर’ में मनमोहन क्रिश्ना ने
‘अंकल फिलीप’ का इसाई पात्र निभाया था। धर्म के भेदभाव के कारण आज़ादी के तुरंत बाद
भारत देश में हुए अविश्वास के वातावरण का एक अनुभव मुंबई आने के बाद भी हुआ था। उस
वक्त वे व्ही. शांताराम के साथ काम करते थे। एक दिन लालबाग में वे अपनी पसंदीदा उर्दू
गज़ल ऊंची आवाज़ में गुनगुना रहे थे। उनके उर्दू उच्चार इतने साफ थे कि लोगों ने उन्हें
मुस्लिम समझकर घेर लिया। तभी किसी ने उन्हें शान्ताराम के स्टुडियो के कर्मचारी के
रूप में पहचान लिया और उस दिन वे बाल बाल बच गए।
मगर शायरी का शौक लाहौर
के दिनों से था और वही उन्हें आउट डोर शूटिंग्स में प्रिय कलाकार बनाता था। यश चोप्रा
ने एक इन्टर्व्यु में बताया था कि युनिट के लिए शूटिंग के बाद के समय में होते मनोरंजन
में मनमोहन क्रिश्ना जी की शायरी का भी अच्छा योगदान रहता था। वैसे भी युनिट के छोटे
बडे सभी के लिये वे परिवार के बडे-बुजुर्ग की तरह होते थे। वे काफी समय तक किसी फ़िल्म
का निर्देशन उन्हें सोंपने के लिए यश जी को कह रह थे। इस लिए जब ‘यशराज’ ने अपने कर्मचारीओं
के लिए एक फ़िल्म बनाने का विचार किया तब उस पिक्चर ‘नूरी’ का निर्देशन मनमोहन क्रिश्ना जी को ही दिया।
‘नूरी’
निर्देशक (मनमोह्न क्रिश्ना) की तरह ही पूनम धिल्लों की भी प्रथम फ़िल्म थी। मगर प्रेम कहानी होने
के साथ साथ उस के गीत-संगीत ने जो धूम मचाई फ़िल्म सुपर हिट हुई और उसके चलते पूनम तो
स्टार हो ही गई, ‘यशराज’ के उस समय के कर्मचारीओं को भी उस सफलता का आर्थिक हिस्सा
मिला। ‘नूरी’ के लिए ‘बेस्ट डीरेक्टर’
के विभाग में १९८० के साल के फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड में ऋषिकेश मुकरजी और खुद यश चोप्रा
तथा श्याम बेनेगल के साथ साथ मनमोहन क्रिश्ना भी मनोनित हुए थे। (अंततः पुरस्कार श्याम
बेनेगल को ‘जुनून’ के लिए मिला था।)
उनकी
अभिनय यात्रा में ‘बैजु बावरा’ और ‘अनारकली’ से लेकर ‘हमराज़’ और ‘मेहबूबा’ तक की
करीब २०० फ़िल्में हैं। अपना करियर व्ही. शान्ताराम
जैसे कलागुरु के हाथ नीचे शुरु करने वाले मनमोहन क्रिश्ना जी १९९० की ३० अक्तुबर के
दिन शान्तारामजी के देहांत के तीन-चार दिन बाद ही, जैसे अपने गुरु को मिलने चले हों,
ऐसे ३ नवंबर, १९९० के रोज हम सब के बीच से बिदा हो गए। मगर उनके वात्सल्यभरे करूणामय
चेहरे के साथ हिन्दी सिनेमा के हम सभी चाहकों के बीच अपनी विविध भूमिकाओं से मनमोहन
क्रिश्ना जी आज भी ज़िन्दा ही हैं।
(इस लेख के लिए सहायक सामग्री प्रदान करने के लिए
हिन्दी सिनेमा के इतिहासविद सुरत के हरीश रघुवंशी जी का विशेष धन्यवाद.)




